वो साल
वो साल वो साल जो चला गया,कुछ इस तरह से जला गया क्या कहूं दामिनी तेरी याद ने हमें रुला गया नए साल के नए महॊल में महोत्स्ब मना रहे लोग मै क्यों उदास हूँ ,न जाने मेरा क्या चला गया... सजा मेलेगी,सज़ा मिलेगी,सज़ा मिल भी जाये तू क्या किसी को दामिनी मिलेगी पहली तारीख जनवरी की,खुस तॊ ऐसे है लोग जैसे ये पहली तारीख जनवरी की सारी ज़िन्दगी न मिलेगी... अच्हा हुआ खुदा तूने उसे जन्नत बुला लिया ये जमीं शायद उसके लायक न रही होगी रोशिनी ही थी कुछ इस तरह के तेरे फलक पैर कर भी कुछ अलग लगेगी... सुबह हरे घास की बूंदों को देख कर सोचा रात आपने हे ठण्ड में तडप रही होगी चख कर देखा तॊ यकीं आया के उसकी आखिरी चीख खुदा के दरवाजे पैर दस्तक दी होगी.... हम सभी कई बहाने से जसं मना लिए दिन ख़त्म होते हे ख्याल आया उसके चाहने वालों की शाम कैसी रही होगी....