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बुढ़ापा

                                                                                              बुढ़ापा एक कमरा ही तो था ,वो भी बेटे बहुँवो के लिए छोड़ दी आज कल आँगन में ही मेरी खाट लगती है  कल रात काफी सर्दी थी आखों की पुतलियाँ चिपक गयी थी सुबह , कुछ साफ़ दिखाई नहीं देता,नज़र कमजोर हो गयी है पर अपने लोगों के मिजाज़ की कडवाहट साफ़ दिखाई देती है कभी चलना सिखाता था बच्चों को उनकी ऊँगली पकड़ कर वो बच्चे आज लकड़ी का डंडा देकर चले गएँ है कहीं और उनके बच्चे वो डंडे को छिपा कर मुझसे खेला करते है उम्र गुजर गयी इज्जत -शोहरत कमाने में , कई लोग आया करते थे हाल पूछने जवानी में जब से ये कम्बखत बुढ़ापा आया ,तब से कोई आता नहीं शायद बुढ़ापा छूवाछूत की बीमारी हो एक पुरानी खाट है जो अक्सर सुबह होते ही बहुएं हटा देती है घर जो साफ़ करना होता है वो भी मेरी तरह ...